हिंदी के मान और अभिमान का डंका पीटने वालों को हिंदी की दुर्दशा पर भी विचार करना चाहिए। भारतीय प्रशासनिक सेवा में पराधीन और आजाद भारत दोनों में आज तक कभी भी हिंदी माध्यम की प्रथम रैंक नहीं आई है और इस साल तो हिंदी माध्यम की एक और 'उपलब्धि 'रही है कि हिंदी माध्यम से कोई भी आईएएस आईपीएस आईएफएस नहीं हो पाया केवल आईएएस एलायड सर्विस में लोग चयनित हुए हैं। सिविल सेवा, उच्चतर न्यायपालिका, विज्ञान प्रौद्योगिकी,शिक्षा में हिंदी भाषा हाशिए पर दिखाई पड़ रही है। मीडिया दूरदराज के हिंदी माध्यम या क्षेत्रीय भाषाओं से चयनित होने वाले किसी एक व्यक्ति को अखबारों में और समाचार चैनलों में गुदडी का लाल कह कर इतना महिमामंडित कर देते हैं कि जैसे लगता है की यही गुदड़ी के लाल ही हर जगह चयनित हो रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है देश की सबसे बड़ी माने जाने वाली परीक्षा में 1000 से ज्यादा पदों में केवल 30 से 40 पदों पर ही गुदड़ी के लाल चयनित होते हैं । महिमामंडन कि यह तकनीक पूंजीवादी तकनीक है जिसमें 'गुड़ खिलाकर डंडे मारे जाते हैं 'यानी सब कुछ अच्छा अच्छा लगता रहे मगर अच्छा होने ना पाए बस लोगों के पास यह संदेश जरूर जाए कि सब कुछ अच्छा हो रहा है ।अपने ही देश में हिंदी भाषा डूबती हुई दिख रही है। हिंदी को दोयम दर्जे की साबित करने वाले विद्वानों का मानना है कि आज जितनी अच्छी सेवाएं और संस्थान हैं वह कहीं ना कहीं अंग्रेजी माध्यम में शासित होने की वजह से ही अपनी श्रेष्ठता बना पाए। हिंदी माध्यम के संस्थानों में वह बात नहीं होती है । इन अंग्रेजी शासित विद्वानों के इस तर्क में कहीं ना कहीं कोई न कोई बात तो जरूर है और जब तक हम हिंदी को उन्नति के शिखर पर नहीं पहुंचाएंगे उनके इन तर्कों का जवाब देना कठिन होगा । दरअसल ,ये अंग्रेजी और हिंदी माध्यम का ही फर्क नहीं है यह फर्क अमीरी और गरीबी का भी है , अमीरजादो को अंग्रेजी के कान्वेंट स्कूलों में पढ़ाया जाता है और सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में वह मासूम और असहाय लोग पढ़ते हैं जिनको हम गरीबी रेखा से नीचे( कुछ अपवादों को छोड़कर) मानते हैं । हद तो तब हो जाती है जब हिंदी भाषा के बड़े बड़े लेखक और पुरस्कार प्राप्तकर्ता लोग भी अपनी आने वाली पीढ़ियों को अंग्रेजी में बोलना, पढ़ना और व्यवहार करना सिखाते हैं।किसी भाषा से हमें बैर नहीं होना चाहिए लेकिन हमें अपनी राजभाषा, राष्ट्रभाषा और मातृभाषा का उद्धार भी करना पड़ेगा ।यह सरकार और जनता दोनों का दायित्व है कि वह भारत की राजभाषा को प्राथमिकता प्रदान कर उसे शिखर पर पहुंचाएं।
आशुतोष एस मन्नू
आशुतोष एस मन्नू
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ReplyDeleteप्रशासनिक सेवा में हिन्दी भाषी लोगों का न होना भी इसके लिए जिम्मेदार माना जा सकता है क्योंकि यहां पर भी पूंजीवादी व्यवस्था दिख रही है प्रशासन में अंग्रेजी माध्यम के लोगों की आधिक्यता है और वो लोग किसी न किसी तरह से अंग्रेजी को ही बढ़ावा देने का कार्य करते हैं जिससे की हम अपनी मातृ भाषा,राष्ट्र भाषा एवं राज्य भाषा का उद्धार नहीं कर पा रहे हैं|
ReplyDeleteअब जो हिन्दी माध्यम से चयनित हो रहे है वो भी तो कहते है की मै जरूर हिन्दी माध्यम से रहा हूं लेकिन बाद में वे भी अग्रेजी के साथ समन्वय कर लेते है
ReplyDeleteअब हिन्दी पढ़ के चयनित ही ना हो पाए तो उस उस हिन्दी को पढ़ के क्या फायदा
इसलिए मजबूरी का नाम अंग्रेजी है