Sunday, June 23, 2019

वन संरक्षण।

हमें अधिक से अधिक पौधो को लगाना है तथा जंगलों को बचाना है। यह कहानी हमें प्रेरित करती है कि हम  अपने पर्यावरण को बचाएं।                                  ..अविश्वसनीय, बेजोड़ , अदभुत कहानी ..., आसाम में रहने वाले एक आदिवासी की जिसके कामो की गूंज ब्रह्मपुत्र की लहरों में बहते , सोंधी जंगली हवाओं में महकते , घने पेड़ो की सरसराहट से होते , हज़ारो किलोमीटर दूर दिल्ली में "राष्ट्रपति भवन"  तक पहुंची  | इस सीधे साधे आदिवासी का नाम है “जाधव पीयेंग ” |  चलिए कहानी शुरू होने के पहले छोटी सी जानकारी दे दूँ | “ब्रह्मपुत्र” नदी को पूर्वोत्तर का अभिशाप भी कहा जाता है | इसका कारण है कि जब यह आसाम तक पहुँचती है तो अपने साथ लम्बी दूरी से बहा कर लायी हुई मिटटी , रेत और पहाड़ी पथरीले अवशेष विशाल “द्रव मलबे” के रूप में लाती है , जिससे  नदी की गहराई अपेक्षाकृत कम हो चौड़ाई में फैल किनारे के गांवो को प्रभावित करती है | मानसून में इसके चौड़े पाट हर साल पेड़ पौधो , हरियाली और गांवो को अपने संग बहा ले जाते है |  ब्रह्मपुत्र नदी का विशालता से फैला हरियाली रहित , बंजर रेतीला तट लगभग रेगिस्तान लगता था | चलिए अब आते है हमारे कहानी के नायक “जाधव पियेंग” पर  | वर्ष 1979 में जाधव 10 वी परीक्षा देने के बाद अपने गाँव में ब्रह्मपुत्र नदी के बाढ़ का पानी उतरने पर इसके बरसाती भीगे रेतीले तट पर घूम रहे थे | तब ही उनकी नजर लगभग 100 मृत सापो के विशाल गुच्छे पर पड़ी | आगे बढ़ते गए तो पूरा नदी का किनारा मरे हुए जीव जन्तुओं से अटा पड़ा एक मरघट सा था । मृत जानवरों के शव के कारण पैर रखने की जगह नही थी | इस दर्दनाक सामूहिक निर्दोष मौत के दृश्य ने जाधव के किशोर मन को झकझोर दिया | हज़ारो की संख्या में निर्जीव जीव जन्तुओ की निस्तेज फटी मुर्दा आँखों ने जाधव को कई रात  सोने न दिया | गाँव के ही एक आदमी ने चर्चा के दौरान विचलित जाधव से कहा जब पेड़ पौधे ही नही उग रहे है तो नदी के रेतीले तटो पर जानवरों को बाढ़ से बचने आश्रय कहाँ मिले ? जंगलो के बिना इन्हें भोजन कैसे मिले ? बात जाधव के मन में पत्थर की लकीर बन गयी कि जानवरों को बचाने पेड़ पौधे लगाने होंगे |                   
                          50 बीज और 25 बॉस के पेड़ लिए 16 साल का जाधव पहुंच गया नदी के रेतीले किनारे पर रोपने | ये आज से 35 साल पुरानी बात है | उस दिन का दिन था और आज का दिन क्या आप कल्पना कर सकते है की इन 35 सालो में  जाधव ने 1360 एकड़ का जंगल बिना किसी सरकारी मदद के लगा डाला |  क्या आप भरोसा करेंगे के एक अकेले आदमी के लगाये जंगल में 5 बंगाल टाइगर ,100 से ज्यादा हिरन ,जंगली सुवर 150 जंगली हाथियों का झुण्ड , गेंडे और अनेक जंगली पशु घूम रहे है, अरे हाँ सांप भी जिससे इस अद्भुत नायक को जन्म दिया | जंगलो का क्षेत्रफल बढाने सुबह 9 बजे से पांच किलोमीटर साइकल से जाने के बाद ,नदी पार करते और दूसरी तरफ वृक्षारोपण कर फिर सांझ ढले नदी पार कर साइकल 5 किलोमीटर तय कर घर पहुँचते |  इनके लगाये पेड़ो में कटहल ,गुलमोहर ,अन्नानाश ,बांस , साल , सागौन , सीताफल, आम ,बरगद , शहतूत ,जामुन, आडू और कई औषधीय पौधे है |लेकिन सबसे आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इस असम्भव को सत्य कर दिखाने वाले साधक से महज़ पांच साल पहले तक देश अनजान था |  ये लौहपुरुष अपने धुन में अकेला आसाम के जंगलो में साइकल में पौधो से भरा एक थैला लिए अपने बनाए जंगल में गुमनाम सफर कर रहा था | सबसे पहले वर्ष 2010 में देश की नजर में आये जब वाइल्ड फोटोग्राफर “जीतू कलिता” ने इन पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाई “the molai forest” | यह फिल्म देश के नामी विश्वविद्यालयों में दिखाई गयी | दूसरी फिल्म आरती श्रीवास्तव की “foresting life” जिसमे जाधव की जिन्दगी के अनछुवे पहलुओं और परेशानियों को दिखाया | तीसरी फिल्म “forest man” जो विदेशी फिल्म महोत्सव में भी काफी सराही गयी  | एक अकेला व्यक्ति वन विभाग की मदद के बिना , किसी सरकारी आर्थिक सहायता के बगैर  इतने पिछड़े इलाके से कि जिसके पास पहचान पत्र के रूप “राशन कार्ड” तक नही है ने हज़ारो एकड़ में फैला पूरा जंगल खड़ा कर दिया | जानने वाले सकते में आ गए उनके नाम पर आसाम के इन जंगलो को “मिशिंग जंगल” कहते है { जाधव आसाम की मिशिंग जनजाति से है} | जीवन यापन करने के लिए इन्होने गाये पाल रखी है | बाघों द्वारा आजीविका के साधन उनके पालतू पशुओं को खा जाने के बाद भी जंगली जानवरों के प्रति इनकी करुणा कम न हुई | बाघो ने मेरा नुकसान किया क्योकि वो अपनी भूख मिटाने खेती करना नही जानते | आप जंगल नष्ट करोगे वो आपको नष्ट करेंगे | एक साल पहले महामहिम “राष्ट्रपति” द्वारा देश के चतुर्थ सर्वोच्च नागरिक सम्मान “पद्मश्री” से अलंकृत होने वाले जाधव आज भी आसाम में बांस के बने एक कमरे के छोटे से कच्चे झोपड़े में अपनी पुरानी में दिनचर्या लीन है | तमाम सरकारी प्रयासों , वक्षारोपण  के नाम पर लाखो रुपये के पौधों की खरीदी करके भी ये पर्यावरण , वनविभाग वो मुकाम हासिल न कर पाये जो एक अकेले की इच्छाशक्ति ने कर दिखाया  । साइकल पर जंगली पगडंडीयों में पौधो से भरे झोले और कुदाल के साथ हरी भरी प्रकृति की अनवरत साधना में ये निस्वार्थ पुजारी | ढेर शुभकामनाये जाधव जी आपने अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकता कहावत गलत साबित कर दी अब तो हम कहेंगे “ *अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है*“ |

Tuesday, June 11, 2019

Generalized system of preferences

Generalized System Of Preferences
 This is an American trade policy, whereby USA imports duty free items in its own country to promote economic development.  Initially, this policy was created keeping in mind the countries of the African continent, gradually expanding its profits to other developing countries.America has given this facility to 129 countries from which about 5000 items (products) are imported.  .USA formed GSP on 1 January 1976 under the Trade Act of 1974.  Under this, if a developing country (if not even mfn) meets the conditions set by the US Congress, then it can export the USA to nearly 2000 products, including goods related to vehicles, parts, clothing etc., at no charge.  USA had withdrawn GSP on 50 Indian products since November 2018.  Bilateral trade in goods and services in the Indo-US trade is around 2% of world trade, but between 2005 and 2017, it has doubled in value to 126 billion.  Under GSP, India had the advantage of $ 5.6 billion or about 40,000 crore exports and was exempted from the import duty. This will not be beneficial if outside the GSP. There are possibilities of damage to landloom and agricultural related products.  In fact, under the 'America First' policy, USA is engaged in improving its economy, as well as emerging as the economic and strategic powerhouse of China in the form of a developing country, and it concerns America somewhere  Do not want to see emerging.  He wishes to give rise to the same equality that can lead to his business and strategic interests.  As far as India is concerned, US President Donald Trump says that in India, more than 100% import duty is imposed on some of our products.  He also discussed the duty of the Harley Davidson motorcycle and said that the import duty imposed on it should be reduced so that our motorcycle can sell more and more.  The US-China Trade War is also going on in the world, as China is trying to make the One Belt One Road (OBOR) through which it is pursuing its economic and strategic interests. Through its china site route and waterways.  America's concern is justified because the US GDP is the world's largest GDP, followed by China's number only. China has been ahead of science technology and space sector. India is also gradually performing better in developing countries.  In the coming time, America may impose other types of economic problems on India. In the  strategic sector, (CAATSA, countering America's adversaries through sanctions act)  The America is trying to impose restrictions on defense trade with other strategic partners such as India and Russia.  America wants to buy India's defense sector products from America and its companies such as Lockheed Martin are flushing and flourishing in return for a few business facilities considering it to India.  Because of the American business policy, our crude oil imports from iran have been affected  today, due to which the prices of oil can increase in India, which can lead to inflation and may have to face the suffering of the Indian public.
 Ashutosh S Mannu
 asst professor

John Maynard keynes versus Adam Smith

Does India need to emphasize the principles of John Maynard Keans (the general theory of employment interest and money) instead of Adam Smith (laissez faire) to bail out India from recession and unemployment?  Do schemes like MNREGA do not seem to support Kean's economic principles somewhere!  Based on purchasing power parity i.e. (ppp), we are the world's third largest economy, if PPP is so strong, then why this recession?  Growth in PPP is almost helpful in recovering from every recession and it is useful to increase the growth rate of every region somewhere.  Do we need to get out of bigger commodities and look again at FMCG Goods.  MBA Guru Philip Kotler has put a lot of emphasis on FMCG Goods in his marketing book.  It is expected that in the coming time the rate of interest will decrease, there will be an increase in salaries of the people and the government will try to increase the liquidity in every way;  Because for these reasons, economic growth rates will reach their destination somewhere in the coming days.  However, we will have to take care of other countries' currency devaluation, trade sanctions, regional economic agreements and trade warfare.  We can also increase export by making the weaker rupee against the dollar.
  Ashutosh S Mannu

Generalized system of preferences

Generalized System Of Preferences
यह एक अमेरिकी  व्यापारी नीति है जिसके तहत यूएसए विकासशील देशों में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए अपने देश में बिना शुल्क वस्तुओं का आयात करता है । प्रारंभ में यह नीति अफ्रीकी महाद्वीप के देशों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी, धीरे-धीरे इसका लाभ अन्य विकासशील देशों तक विस्तारित किया गया।अमेरिका ने 129 देशों को यह सुविधा दी है जहां से लगभग 5000 वस्तुओं (प्रोडक्ट) का आयात होता है ।यूएसए ने ट्रेड एक्ट 1974 के तहत 1 जनवरी 1976 को जीएसपी का गठन किया था। इसके तहत अगर कोई विकासशील देश (mfn नही है तो भी)अमेरिकी कांग्रेस द्वारा तय शर्तों को पूरा करता है तो वह वाहन ,कल पुर्जों, कपड़ों आदि से जुड़ी सामग्री सहित करीब 2000 उत्पादों को यूएसए को बिना किसी शुल्क के निर्यात कर सकता है। यूएसए ने नवंबर 2018 से ही 50 भारतीय उत्पादों पर जीएसपी वापस ले लिया था। भारत-अमेरिका व्यापार में वस्तुओं और सेवाओं में द्विपक्षीय व्यापार ,विश्व व्यापार का लगभग 2% है लेकिन 2005 से 2017 के मध्य यह मूल्य में दोगुना होकर 126 बिलियन तक पहुंच गया है। जीएसपी के तहत भारत को 5.6 अरब डॉलर यानी करीब ₹40000 करोड़ के एक्सपोर्ट का फायदा होता था तथा आयात शुल्क से छूट मिलती थी ।जीएसपी से बाहर होने पर यह फायदा नहीं मिलेगा ।हैंडलूम व कृषि से जुड़े उत्पादों को नुकसान होने की संभावनाएं हैं। दरअसल ,'अमेरिका प्रथम' नीति के तहत यूएसए अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने में लगा हुआ है ,साथ ही साथ विकासशील देश के रूप में चीन का आर्थिक एवं सामरिक महाशक्ति के रूप में उभरना अमेरिका को चिंतित करता है और वह कहीं ना कहीं विकासशील देशों को उभरते हुए देखना नहीं चाहता। वह उतना ही उभरने देना चाहता है जिससे उसके व्यापारिक एवं सामरिक हित सध सकें। जहां तक रही भारत की बात तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि भारत में हमारे कुछ उत्पादों पर 100% से अधिक आयात शुल्क लगाया जाता है। उन्होंने हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल के शुल्क की चर्चा भी की थी और कहा था कि इस पर लगने वाले आयात शुल्क को कम किया जाए जिससे हमारी मोटरसाइकिल अधिक से अधिक बिक सकें। दुनिया में अमेरिका- चाइना ट्रेड वार भी चल रहा है चूँकि चाइना वन बेल्ट वन रोड(OBOR)  बनाने का प्रयास कर रहा है जिसके माध्यम से वह अपने आर्थिक एवं सामरिक हितों को साध रहा है ।चीन स्थल मार्ग तथा जलमार्ग दोनों के माध्यम से अपना पैर पसार रहा है। अमेरिका की चिंता जायज भी है क्योंकि अमेरिकी जीडीपी दुनिया की सबसे बड़ी जीडीपी है उसके बाद चीन का ही नंबर आता है ।चीन विज्ञान तकनीक एवं अंतरिक्ष  क्षेत्र में काफी आगे हो चुका है ।भारत भी धीरे-धीरे करके विकासशील देशों में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है तो आने वाले समय में अमेरिका ,भारत के ऊपर अन्य प्रकार की आर्थिक समस्याएं थोप सकता है ।सामरिक क्षेत्र में  काटसा (CAATSA, countering America's  adversaries through sanctions act ) के माध्यम से भारत के रूस जैसे अन्य सामरिक साथियों रक्षा व्यापार पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास कर रहा है । अमेरिका चाहता है की भारत रक्षा क्षेत्र के उत्पाद अमेरिका से ही खरीदें और उसकी लॉकहीड मार्टिन जैसी कंपनियां पुष्पित एवं पल्लवित होती रहे बदले में थोड़ी-थोड़ी व्यापार सुविधाएं व भारत को देने पर विचार कर रहा है । अमेरिकी व्यापारिक नीति की वजह से ही आज ईरान से हमारे कच्चे तेल का आयात प्रभावित हुआ है जिसकी वजह से भारत में तेल के दाम बढ़ सकते हैं जिससे महंगाई में भी उछाल आ सकता है और भारतीय जनता को कष्ट का सामना करना पड़ सकता है।
आशुतोष एस मन्नू
अ.प्रोफेसर

Monday, June 10, 2019

हिंदी की गरीबी।

हिंदी के मान और अभिमान का डंका पीटने वालों को हिंदी की दुर्दशा पर भी विचार करना चाहिए। भारतीय प्रशासनिक सेवा में पराधीन और आजाद भारत दोनों में आज तक कभी भी हिंदी माध्यम की प्रथम रैंक नहीं आई है और इस साल तो हिंदी माध्यम की  एक और 'उपलब्धि 'रही है कि हिंदी माध्यम से कोई भी आईएएस आईपीएस आईएफएस नहीं हो पाया केवल आईएएस एलायड सर्विस में लोग चयनित हुए हैं। सिविल सेवा, उच्चतर न्यायपालिका, विज्ञान प्रौद्योगिकी,शिक्षा में हिंदी भाषा हाशिए पर दिखाई पड़ रही है।  मीडिया दूरदराज के हिंदी माध्यम या क्षेत्रीय भाषाओं से चयनित होने वाले किसी एक व्यक्ति को अखबारों में और  समाचार चैनलों में गुदडी का लाल कह कर इतना महिमामंडित कर देते हैं कि जैसे लगता है की यही  गुदड़ी के लाल ही  हर जगह चयनित हो रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है देश की सबसे बड़ी माने जाने वाली परीक्षा में  1000 से ज्यादा पदों में  केवल 30 से 40 पदों पर ही गुदड़ी के लाल चयनित होते हैं । महिमामंडन कि यह तकनीक पूंजीवादी तकनीक है जिसमें 'गुड़ खिलाकर डंडे मारे जाते हैं 'यानी सब कुछ अच्छा अच्छा लगता रहे  मगर अच्छा होने ना पाए बस लोगों के पास यह संदेश जरूर जाए कि सब कुछ अच्छा हो रहा है ।अपने ही देश में हिंदी भाषा डूबती हुई दिख रही है। हिंदी को दोयम दर्जे की साबित करने वाले विद्वानों का मानना है कि आज जितनी अच्छी सेवाएं और संस्थान हैं वह कहीं ना कहीं अंग्रेजी माध्यम में शासित होने की वजह से ही अपनी श्रेष्ठता बना पाए। हिंदी माध्यम के संस्थानों में वह बात नहीं होती है । इन अंग्रेजी शासित विद्वानों के इस तर्क में कहीं ना कहीं कोई न कोई बात तो जरूर है और जब तक हम हिंदी को उन्नति के शिखर पर नहीं पहुंचाएंगे उनके इन तर्कों का जवाब देना कठिन होगा । दरअसल ,ये अंग्रेजी और हिंदी माध्यम का ही फर्क नहीं है यह फर्क अमीरी और गरीबी का भी है , अमीरजादो को अंग्रेजी के कान्वेंट स्कूलों में पढ़ाया जाता है और सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में  वह मासूम और असहाय लोग पढ़ते हैं  जिनको हम गरीबी रेखा से नीचे( कुछ अपवादों को छोड़कर) मानते हैं । हद तो तब हो जाती है जब हिंदी भाषा के बड़े बड़े लेखक और पुरस्कार प्राप्तकर्ता लोग भी अपनी आने वाली पीढ़ियों को  अंग्रेजी में बोलना, पढ़ना  और व्यवहार करना सिखाते हैं।किसी भाषा से हमें बैर नहीं होना चाहिए लेकिन हमें अपनी राजभाषा, राष्ट्रभाषा और मातृभाषा का उद्धार भी करना पड़ेगा ।यह सरकार और जनता दोनों  का दायित्व है कि वह भारत की राजभाषा को प्राथमिकता प्रदान कर उसे शिखर पर पहुंचाएं।
 आशुतोष एस मन्नू

एडम स्मिथ बनाम जॉन मेनार्ड केंस

क्या भारत को  मंदी और बेरोजगारी से उबारने के लिए एडम स्मिथ( laissez faire) की जगह जॉन मेनार्ड कींस( the general theory of employment interest and money) के सिद्धांतों पर जोर देने की ज़रूरत है? क्या मनरेगा जैसी योजनाएं कहीं ना कहीं कींस के आर्थिक सिद्धांतों का समर्थन करती हुई प्रतीत नहीं होती हैं!  क्रय शक्ति समता यानि (ppp)के आधार पर हम विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है अगर पीपीपी इतनी ही मजबूत है तो यह मंदी क्यों? पीपीपी में बढ़ोतरी हर प्रकार की मंदी से उबरने में लगभग सहायक होती है और कहीं ना कहीं हर क्षेत्र की  संवृद्धि दर को बढ़ाने में मददगार होती हैं। क्या हमें बड़ी -बड़ी वस्तुओं से निकलकर फिर से एफएमसीजी गुड्स की ओर झांकने की जरूरत है।  एमबीए गुरु फिलिप कोटलर  ने  अपनी मार्केटिंग की किताब में एफएमसीजी गुड्स पर बहुत जोर दिया है। उम्मीद है आने वाले समय में ब्याज दर और घटेगी, लोगों की तनख्वाह में बढ़ोतरी होगी और सरकार हर प्रकार से तरलता में वृद्धि करने का प्रयास करेगी; क्योंकि इन्हीं वजहों से कहीं ना कहीं आने वाले समय में आर्थिक संवृद्धि(economic growth )दर अपने मुकाम पर पहुंच सकेगी। यद्यपि हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अन्य देशों के मुद्रा अवमूल्यन, व्यापार प्रतिबंधों ,क्षेत्रीय आर्थिक समझौतों तथा ट्रेड वार का भी ध्यान रखना पड़ेगा। डॉलर के मुकाबले कमजोर होते रुपए को अस्त्र बनाकर हम निर्यात में बढ़ोतरी भी कर सकते हैं।
 आशुतोष एस मन्नू

वन संरक्षण।

हमें अधिक से अधिक पौधो को लगाना है तथा जंगलों को बचाना है। यह कहानी हमें प्रेरित करती है कि हम  अपने पर्यावरण को बचाएं।                    ...